ब्रह्मसूत्र जनेऊ धारण करने के नियम ! Janeu Mantra

Yagyopavit/Janeu ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ, वानप्रस्थ तीनों आश्रमों के लिए अनिवार्य है। ब्राह्मण के लिए १२ वर्ष, क्षत्रिय के लिए १६ वर्ष, वैश्य के लिए २० वर्ष के मध्य ही यज्ञोपवीत धारण कर लेना चाहिए। यज्ञोपवीत मात्र धागा नहीं है। इसे ब्रह्म सूत्र कहा जाता है। इस कारण यज्ञोपवीत को ब्रह्म शक्ति भी समझें। जनेऊ के नियम होते है इनका पालन धारण करने वाले व्यक्ति को करना होता है ! इस लेख में आपको जनेऊ धारण के नियम और जनेऊ(Janeu) कब धारण करे तथा कब बदले,Yagyopavit mantra मंत्र के बारे में जानकारी प्रदान की गयी है !

यज्ञोपवती/जनेऊ | Yagyopavit/Janeu Dharan

  • जब कन्धे से खिसक जाएं। कोई धागा टूट जाए, शौच के समय कान पर डालना
    भूल जाएं।
  • गृहस्थ और वानप्रस्थी को दो यज्ञोपवीत डालने चाहिए। ब्रह्मचारी एक यज्ञोपवीत पहन सकता है।
  • चार महीने बीतने पर नया यज्ञोपवीत धारण कर लेना चाहिए।
  • चन्द्र ग्रहण, सूर्य ग्रहण, मरण, शौच, श्राद्ध में यज्ञ इत्यादि कार्यों के समय भी यज्ञोपवीत बदल देना चाहिए।
  •  यज्ञोपवीत कमर तक रहना चाहिए।

जनेऊ मंत्र / Janeu/Yagyopavit Mantra

पलाश या पीपल के पत्ते में रखकर जल से प्रक्षालित करें। तदन्तर एक-एक मंत्र पढ़कर अक्षत और फूलों को यज्ञोपवीत पर छोड़ते जाएं।  प्रथम ग्रन्थि – ॐ ब्रह्मणे नमः ब्रह्माणमावाहयामि। द्वितीय ग्रन्थि – ॐ विष्णवे नम: विष्णुमावाहयामि। तृतीय ग्रन्थि – ॐ रुद्राय नमः रुद्रमावाहयामि।  विनियोगः-ॐ यज्ञोपवीतमिति मन्त्रस्य परमेष्ठी ऋषिः लिङ्गोक्ता देवताः। त्रिष्टुप छन्दः यज्ञोपवीत धारणे विनियोगः।

Janeu/Yagyopavit को बदलने की विधि 

पुराने (जनेऊ) यज्ञोपवीत को कण्ठी जैसा बनाकर सिर पर पीठ की ओर निकाल कर उसे जल में प्रवाहित कर दें। इसके बाद यथा शक्ति गायत्री मन्त्र का जप करें फिर ॐ तत्सत् श्री ब्रह्मपर्णमस्तु हाथ जोड़ कर भगवान को स्मरण करें।

तिलक लगाने की विधि

तिलक अवश्य करना चाहिए। इसके बिना सत्कर्म सफल नहीं होता।  तिलक बैठकर ही लगायें। तिलक तीन प्रकार के होते हैं जैसे मिट्टी, चन्दन, भस्म इच्छ धारण करें। फिर भी संक्षिप्त में लिख रहा हूँ। वैष्णव के लिए चन्दन से का. शैव के लिए भस्म का गृहस्थ के लिए मिट्टी का।

तिलक मंत्र/Tilak Mantra

ॐ अग्निरिति भस्म। मिट्टी से – ॐ स्थलमिति भस्म। ॐ चन्दनमिति भस्म। या ॐ नमः शिवाय, नमः विष्णवे, ॐ नमः शक्तिये।

पवित्री धारण के लिए महत्पूर्ण नियम 

    • स्नान, सन्ध्योपासन, पूजन, जप, होम, वेदाध्ययन और पितृकर्म में पवित्री धारण अवश्य करनी चाहिए।
    •  पवित्री वैसे तो कुशा की ही पवित्र मानी जाती है। फिर भी कहीं कहीं सोने व चांदी का भी वर्णन आया है। इसलिए दोनों धातुओं में से
      सुविधानुसार पहन सकते हैं।
    •  पवित्री हमेशा अनामिका अंगुली में ही धारण करें।
    •  जप तीन प्रकार का माना गया है। जैसे वाचिक, उपांशु और मानसिक।
    • वाचिक जप-जप धीरे-धीरे करें। उंपाशु में दूसरा न सुन सके। मानसिक में मात्र मन से किया जाता है। जिसमें जीभ और ओंठ भी नहीं हिलना चाहिए। इन तीनों में मानसिक जप दोनों की अपेक्षा श्रेष्ठ माना गया
    • जप के समय ध्यान रखें की माला नीचे न गिरें, इसलिए उसे गोमुखी में सुरक्षित रखें। पक समय छींक, हंसना बोलना, खजलाना, भटकना ये सब वर्जित है। माला कम से कम १०८ मनकों की हो, रुद्राक्ष माला द्वारा आप समस्त जप कर सकते हैं।
    • सन्ध्या हमेशा त्रिकाल करें, उससे मनुष्य पाप रहित हो जाता है।
    • समय पर की गई सन्ध्या इच्छानुसार फल देती है। बिना समय की सन्ध्या निष्फल समझें।
    • प्रात: काल पूर्व को तथा सायं काल में पश्चिम की तरफ करने का विधान है।
    • गायत्री के मंत्र जपते समय पहले ही ॐ लगाना चाहिए बाद में नहीं।
    • घर की तुलना मन्दिर में सन्ध्या करने का फल सौ गुना अधिक समझें।
    • पैर धोने से, पीने से, सन्ध्या करने पर जो जल बच जाए उसको विसर्जन कर दें, क्योंकि वह श्वान के मूत्र के तुल्य माना जाता है।
    • जिनके पास समय का अभाव हो, वे कम से कम गायत्री मंत्र की एक माला अवश्य जप लें। या सूर्य को अर्घ्य देकर बारह नामों से सूर्य को प्रणाम करें। उससे सन्ध्या की पूर्ति करें।
    • प्राणायाम शास्त्रों का कथन है, कि जिस तरह पर्वत से निकले धातुओं का मल अग्नि से जल जाता है, वैसे ही प्राणायाम से आन्तरिक पाप जल जाते हैं । इसलिए हो सके तो प्राणायाम अवश्य करें।
    • प्राणायाम नित्य करने वाला मनुष्य अग्नि की तरह चमक उठता है।
    • भगवान कथन है कि प्राणायाम द्वारा मनुष्य दीर्घ जीवि होता है।

इस लेख में आपको जनेऊ/यज्ञोपवीत मंत्र से सम्बंधित दी हुई जानकारी केसी लगी कृपया कमेंट करके जरूर बताये और धर्म और मेडिटेशन से सम्बंधित लेख पड़ने के लिए हमारी वेबसाइट को बुकमार्क करे। कपालभांति को हठयोग भी कहते है।

यज्ञोपवती

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