देवी देवताओं की प्राण-प्रतिष्ठा मंत्र और सामग्री | Pran Pratishtha Vidhi

किसी भी मंदिर के निर्माण के बाद सबसे पहले उनमें स्थापित होने वाले देवी देवताओं की मूर्तियों की प्राण-प्रतिष्ठा(Pran Pratishtha Vidhi) की जाती है। पूरे नियम अनुसार इसे किया जाता है। देवताओं की प्रतिष्ठा कर्म करने में 3 से 5 दिन लगते हैं। इस अनुष्ठान को प्रतिमाओं को जागृत करने के लिए किया जाता है। वैदिक मंत्रों और ध्वनियों के साथ भगवान की मूर्तियों का अभिषेक किया जाता है। मंत्रों की शक्ति से मूर्तियों में देवता वास करते हैं जो भक्तों के लिए बहुत फलदायी होता है| प्राण-प्रतिष्ठा लोग अपने घर के मंदिरों में भी कराते हैं। जिस घर में प्राण प्रतिष्ठा होती है उस घर में भगवान साक्षात निवास करते हैं।

प्राण-प्रतिष्ठा विधि के लिए फूल – Pran Pratishtha Vidhi

देवताओं की Pran Pratishtha Vidhi और पूजा में फूलो का बहुत महत्व होता है | हम मंदिर या अपने घर में भी भगवान को फूल चढ़ाते है | आइये जानते है कोनसा फूल कोनसे भगवान को पसंद है |

१. विष्णु प्रसन्नता के लिए – तुलसी दल पत्र। २. शिव प्रसन्नता के लिए – बिल्व फल या पत्र। ३. गणेश प्रसन्नता के लिए – दुर्वा अंकुर। ४. शक्ति प्रसन्नता के लिए – लाल फूल व नारियल। ५. सूर्य प्रसन्नता के लिए – नित्य अर्घ्य। ६. हनुमान प्रसन्नता के लिए – लाल बूंदी, लाल वस्त्र। ७. भैरव प्रसन्नता के लिए – तेल भरा दीपक। ८. पित्रों की प्रसन्नता के लिए – सफेद वस्त्र सफेद फूल। ९. गुरु प्रसन्नता के लिए – चरण वन्दना। १०. शुक्र प्रसन्नता के लिए – चावल दान। ११. राहु प्रसन्नता के लिए – तिल दान। १२. केतु प्रसन्नता के लिए – अन्न दान।

देवताओं की प्राण-प्रतिष्ठा नियम – Pran Pratishtha Vidhi Niyam

  •  चैत्र, बैसाख, ज्येष्ठ, माघ एवं फाल्गुन में सभी देवताओं की प्रतिष्ठा शुभ मानी गई है।
  • माघ मास में प्रतिष्ठा करने से यजमान को विनाश होता है।
  •  हस्त, चित्रा, स्वाती, अनुराधा, श्रवण से तीन खेती, अश्विनी पुनर्वसु,पुष्प, तीनों, उत्तरा, रोहिणी, मृगशिरा, नक्षत्र समस्त देवी-देवताओं की प्रतिष्ठा हेतु शास्त्रकारों ने उत्तम बताया हैं।
  • रविवार की प्रतिष्ठा(Pran Pratishtha Vidhi) तेजस्वनी, सोमवार को कल्याणकारी, मंगलवार अग्निदाहकारिणी, बुधवार को धनदायिनि, बृहस्पतिवार को बलदायिनी, शुक्रवार को आनन्दकारिणी तथा शनिवार को सामर्थ्यनाशवान मानी गई है।
  • देवी प्रतिष्ठा के लिए अश्विनी और माघ अति उत्तम माने गये हैं। नृसिंह पुराण के अनुसार उग्र देवताओं के लिए अश्विनी मास श्रेष्ठ तथा समस्त कामनाओं को देने वाला बताया गया है।
  •  खण्डित मूर्तियों की स्थापना कदापि न करें।
  •  चोर, चाण्डाल, पतित, श्वान और रजस्वला स्त्री के स्पर्श से मूर्ती को पुनः प्रतिष्ठित करने का विधान है।
  •  जो मनुष्य सुख की अभिलाषा रखता हो, उसे विष्णु की प्रतिष्ठा का करनी चाहिए।
  •  रात्रि में कलश स्थापना एवं कुम्भादिसेंचन नहीं करना चाहिए।
  •  विसर्जन और आवाहन अस्थिर मूर्तियों में न करें।
  •  बलिदान से देवी अवश्य प्रसन्न होती है परन्तु बलिदान देने वाले को पाप लगता है।
  • सभी देवताओं का पूजन पुरुष सूक्त द्वारा किया जा सकता है।
  •  गणेश जी को तुलसी छोड़कर बाकी सब पत्र प्रिय हैं।
  • भैरव पूजा में भी तुलसी पूज्य नहीं है।
  • केतकी पुष्प शिव पूजा में न लायें, न चढ़ायें।
  • करवीर से विष्णु की पूजा न करें।
  • सूर्य भगवान को बिल्वपत्र न चढ़ायें।।
  • देवताओं के पूज्यार्थ दीपक बुझाना नहीं चाहिए।
  • पूजा करते समय अपने से श्रेष्ठ व्यक्ति जैसे माता-पिता, गुरु जी आ जाएं तो तुरन्त उठकर प्रणाम करना चाहिए।
  • अपने से बड़ों को आर्शीवाद से प्रणामी व्यक्ति की आयु बढ़ती है।
  • कमल को पांच रात, बिल्व को दश, तुलसी को ग्यारह रात के बाद पुनः प्रक्षालन के बाद चढ़ाया जा सकता है।
  • पंच्चामृत में अगर अन्य चार वस्तुएं उपलब्ध न हों तो गाय दूध से कार्य कर सकते हैं।
  • पिघला हुआ घी, पतला चन्दन देवताओं को कदापि न चढ़ायें।
  • दीपक से दीपक जलाने पर व्यक्ति दरिद्री हो जाता है।
  • द्वादशी, संक्रान्ति, रविवार पक्षान्त, निशा और सन्ध्या काल में तुलसी कदापि न तोड़ें।
  • जहां अपूज्यों की पूजा और विद्वानों का अनादर होता है, वहां का पतन निश्चित समझें।
  • लक्ष्मी पूजन के लिए सोम, बुध, शुक्र और रविवार उत्तम है।
  • जो देवताओं का पूजन नहीं करता है। उसके परिवार को देव स्वयं भक्षण कर जाते हैं।
  • लक्ष्मी की कामना वाले को तांबे या ईंट के कुण्ड में ही हवन करना चाहिए।
  • हवन के समय सभी मंत्रों को स्वाहा का उच्चारण करना चाहिए।
  • जो ब्राह्मण को यज्ञ के बाद सन्तुष्ट न कर सका। उसका यज्ञ असफल समझें।
    ब्राह्मण के लिए चार बातों पर अवश्य ध्यान दें, प्रणाम, भोजन, दान तथा दक्षिणा।
  • रुद्रयाग में 1811 आहुतियां होती हैं। ४२. विष्णुयाग में 16,000 आहुतियां होती हैं। गणेशयाग में एक लाख आहुतियां होती हैं।
  •  मण्डप के नौ भाग होने चाहिए, जो सम हों।
  • बिना श्रृंगार का मण्डप यजमान का नाश कर देता है।

प्राण-प्रतिष्ठा कर्म

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