वैवाहिक समस्याओ को दूर करता है श्री पुरुष सूक्त – Shri Sukta

अपने जीवन में सकारात्मक प्रभाव प्राप्त करने के लिए श्री पुरुष सूक्त(Shri Sukta) का पाठ करना चाहिए | पढ़ने वाले विद्यार्थियों के लिए भी इसका पाठ करना अच्छा रहता है | इस(Shree Shuktam) पाठ से मन को शांति मिलती है | जिन लोगो के वैवाहिक जीवन में समस्या चल रही है उनको इसका पाठ करना चाहिए |

Shree Shuktam ! Shri Sukta अर्थ सहित

सहस्रशीर्षां पुरुष सहस्राक्षः सहस्रपात।स भूमिं सर्वत स्पृत्वात्यतिप्ठ दृशागुलम्॥१॥

भावार्थ-परम पुरुष श्री के हजार सिर हजार नेत्र, हजार पैर हैं। वह पृथ्वी को सभी तरफ से व्याप्त कर ब्राह्मण्ड से भी दश अंगुल अथवा उससे भी ऊपर है।
पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भाव्यम्।उतामृत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ॥२॥

भावार्थ-वह विराट पुरुष भूत, भविष्य, वर्तमान में व्याप्त रहता है। यह सृष्टि विराट पुरुष रूप ही है। वह देवों और सृष्टि प्राणियों का स्वामी है।
एतानावनस्य महिमातो जयायांश्च पुरुषः।पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि॥३॥

भावार्थ-विशाल ब्रह्माण्ड भी उस विराट पुरुष की लीला है। वह अपने विस्तार से भी अधिक विस्तृत है। उस परम पुरुष के एक पैर जितने विस्तार में पाँच तत्वों से युक्त ब्रह्माण्ड है। बाकी तीनों पैरों जितने विस्तार में अमृतमयी दिव्यलोक है।

       त्रिलादूर्ध्व विश्वं पुरुषः पादोऽस्येहाभवत् पुनः।ततो विश्वं व्याक्रामत् साशनानशने अभिः ॥४॥

भावार्थ-वह विराट पुरुष इस सृष्टि से अलग तीन पैर विस्तार जितने क्षेत्र में प्रकाश रूप से विद्यमान है। उसके एक चरण में ही यह ब्रह्माण्ड व्याप्त है। यह जड़ चैतन्य सृष्टि उसी पुरुष के कारण है।
ततो विराडजायत विराजो अधि पुरुषः।स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद् भूमिमथो पुरः॥५॥

भावार्थ-विराट पुरुष विष्णु का ही रूप है। उस विराट पुरुष के आदि पुरुष विष्णु जी ही है। जो अलौकिक प्रकाश वाले हैं। इनसे प्रजापति यज्ञ (पुरुष हुआ, जिससे पृथ्वी, शरीर आदि की सृष्टि हुई)।

तस्माद् यज्ञात्सर्वहुतः समभृतं पृपदाज्यम्।पशून्तान्श्चकेवायव्यानाराण्यान ग्राम्याश्च ये॥६॥

भावार्थ-इसी रचना में पोषक पदार्थों की उत्पति हुई। प्रजापति पुरुष ब्रह्माजी ने वायु में विचरण करने वाले पक्षी आदि, गांव व वनों में रहने वाले जीवों की उत्पति की।

तस्माद् यज्ञात्सर्वहुत ऋचः सामानि जाजिरे।छन्दासिजाज्ञिरै तस्माद यजुस्तस्माद जायत ॥७॥

भावार्थ-फिर विराट पुरुष से ऋग्वेद व सामवेद की उत्पति हुई उन्हीं ऋचाओं से यजुर्वेद की भी उत्पति मानी गई है।
तस्मादश्वा अजायन्त ये के चोभद्यादतः।गावोहजज्ञिरे तस्मात्तभाञ्जाता अजावयः ॥८॥

भावार्थ-उसी यज्ञ पुरुष से घोड़े, गधे, एवं गायें भेड़, बकरियों की उत्पति हुई।
ते यज्ञं बर्हिषि प्रौझन्पुरुषं जातमग्रतः।तेन देवा अजयन्त साध्या ऋष्यश्च ये॥९॥

भावार्थ-सृष्टि के प्रारंभ से उत्पन्न हुए विराट पुरुष को कुशाओं से प्रेक्षित करके देवता ऋषि व सिद्धगणों की रचना की गई

यत्पुरुषं व्यदधुः कतिधा व्यकल्पयन्। मुखं किसस्यासीत् किम्बाहु किमरू पादोच्यते॥१०॥

भावार्थ-उस विराट पुरुष, यज्ञ पुरुष या प्रजापति को अनेक रूपों में उत्पन्न करने के बाद विभिन्न तरह से कल्पना की गई,कि विराट पुरुष का मुख क्या है ? कौन सी भुजा है ? जंघा कौन सी है तथा पैर कहां है ?

ब्राह्ममोऽस्य मुखमसद् िबाहू राजन्यः कृतिः।अरुतदस्य यद् वैरवः पद्भ्यां शुद्रो अजायत्॥११॥

भावार्थ-विराट पुरुष के मुख से ब्रह्मण भुजाओं से क्षत्रिय जांघों से वैश्य पैरों से शुद्र की उत्पति मानी गई है।
चंद्रमा मनसा जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत।श्रोत्राद वायुश्च प्राणाश्च मुखादग्निरजायत्॥१२॥

भावार्थ-मन से चन्द्रमा, नेत्रों से सूर्य, कानों से वायु तथा प्राण की उत्पति हुई। एवं मुख से अग्निदेव की उत्पति मानी गई।
नाभ्या आसीदलरिक्षं शीणों धौ समवर्चत्।पदभ्यां भूमिमदिशं। श्रोताचतालोकां अकत्पयन॥१३॥

भावार्थ-यज्ञ पुरुष की नाभी से अन्तरिक्ष लोक, सिर से स्वर्ग पैरों से पृथ्वी, कानों से दिशायें उत्पन्न हुई। ऐसा माना गया है। सभी लोकों की उत्पति भी उस विराट पुरुष ने ही की है।
यत् पुरुषेण हविषा देवा यज्ञतन्वत।वसन्तो अस्यासीदाज्यं ग्रीष्म इध्म शरदविः ॥१४॥

भावार्थ-उस विराट पुरुष के शरीर से ही देवों ने हविष्य की भावना करके यज्ञ विस्तार किया। यज्ञ में घृत को बसन्त ऋतु, ईंधन को ग्रीष्म ऋत और हवि को शरद ऋतु माना गया।

सप्तास्यासन परि ध्यासा: सप्त समिधः कृताः।देवा यद् यज्ञं तन्वानाऽवघ्न पुरुषप्शुम ॥१५॥

भावार्थ-जिस मादा (पुरुष) पशु का यज्ञ में बन्धन करके देवताओं ने यज्ञ किया, उसी से सात छन्द व उनकी परिधियां मानी गई हैं और इक्कीस समिधाएं कल्पित की गई। वो इक्कीस समिधाएं इस प्रकार हैं। बारह महीने, पांच ऋतुएं, एक आदित्य, तीन लोक।

भावार्थ-देवता उसी विराट पुरुष का यज्ञ द्वारा यजन करते हैं। इन्हीं धर्मों का अस्तित्व कल्पों में भी था। जिस स्वर्ग लोग में पूर्व के सिद्ध देवगण रहते थे। उसी में उनके उपासक भी पहुंचते हैं।

अभ्यः सम्भृतं पाथ्व्यै रसाच्य विश्वकर्मणं समवर्त्तताये। वस्य त्वष्टा विदधद् रूपमेति तन्मय॑स्य देवत्वमाजायग्रे॥१७॥
भावार्थ-फिर आगे चलकर जल, भूमि और रस की उत्पत्ति हुई। उसी रस को ग्रहण करके सूर्यदेव प्रतिदिन निकलते हैं। मनुष्यों के बाद शुभ व प्रधान देवताओं की रचना की गई।
वेदाहमेतं पुरुषं महासमादित्यवर्णं तमसभरस्तात्। तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पंथा विधतेऽयनाय॥१८॥
भावार्थ-जो आदित्य मंडल में अन्धकार से दूर स्थित हैं, मनुष्य उस विराट पुरुष का भेद जानकर मृत्यु को जीत जाता है। इसके अलावा मुक्ति का कोई दूसरा मार्ग नहीं है।

प्रजापतिश्चरति गर्भे अन्तरजयमानो बहुधा विजायते।  तस्य येनिं पारिपश्यान्ति धरिस्तास्मिन हतस्थुर्भुवत्तानि विश्वा॥१९॥
भावार्थ-प्रजापति नामक वह विराट पुरुष अंत हृदय में स्थिर रहकर गर्भ में प्रविष्ट होता है और आजीवन उसके गुह्य स्थान से भली-भांति परिचित है। यह सम्पूर्ण विश्व उसी में समाया हुआ है।

भावार्थ-देवताओं को तेज प्रकट करने वाले विराट पुरुष ही हैं। जो देवताओं के कुल पुरोहित भी हैं और उनसे पहले प्रकट होने वाले देव को नमस्कार।
रूंचं बाह्यं जनयन्तो देवा अग्रे तवब्रुवन।यस्तेवं ब्राह्मणो विद्यातस्य देवा असंवशे॥२१॥

भावार्थ-ब्रह्मरूप में जानने योग्य ज्योति स्वरूप आदित्य देव को प्रकट करते हुए देवताओं ने भी पहले कहा था कि जो ब्राह्मण तुम्हें जान जाएंगे व देवता के वशीभूत होंगे।

 

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पुरुष सूक्त