Vitamin K :इन सभी बातों का ध्यान रखकर उपयोग करें विटामिन-के

विटामिन-के वसा में घुलनशील होता है। यह विशेष प्रोटीन जिसे प्रोट्रोंबिन कहा जाता है अन्य कारकों को बनाने में योगदान देता है। इसे रक्तस्राव-रोधी विटामिन के रूप में जाना जाता है। इस विटामिन को 1935 में डैम ने खोजा। सामान्य थक्के बनाने के लिये अल्फाल्फा नामक घास का प्रयोग किया जाता है। डैम ने इन तत्वों में पाए जाने वाले रक्तस्राव-रोधी कारक को विटामिन-के का नाम दिया।

Vitamin K

विटामिन-के प्रकृति में दो रूपों में उपस्थित होता है। विटामिन-के पीला तेल है जो वसा घोलों में घुलनशील होता है लेकिन पानी में कम ही घुलता है। विटामिन-के2 को बैक्टीरिया द्वारा पैदा किया जाता है। विटामिन-के प्रकाश, उष्मा या वायु के संपर्क में आने से भी आसानी से नष्ट नहीं होता। लेकिन यह तीव्र एसिड, क्षारों तथा आक्सीकरण करने वाले कारकों से नष्ट हो जाता है। विटामिन-के को नष्ट करने वाले अन्य कारक हैं जैसे एक्सरे तथा विकिरण,फ्रोज़न किए गए भोजन, एस्पिरिन, वायु प्रदूषण तथा खनिज
तेल।

यकृत में भंडारित विटामिन-के का लगभग 50 प्रतिशत भाग भोजन से तथा शेष 50 प्रतिशत बैक्टीरिया द्वारा आंतों में किए गए उत्पादन से आता है। इसके अवशोषण के लिये पित्त आवश्यक होती है। अवशोषित विटामिन लसिका तंत्र में से गुज़रकर सामान्य संचार में आता है। यकृत में इस विटामिन की पर्याप्त मात्रा एकत्र रहती है। शरीर द्वारा विटामिन-के को मुश्किल से ही उत्सर्जित किया जाता है। विटामिन-के के उत्सर्जन का मुख्य मार्ग मल-त्याग है।

Vitamin K के कार्य

विटामिन-के आंतरिक रक्तस्राव की रोकथाम के लिये आवश्यक होता है। महिलाओं में यह अत्यधिक मासिक प्रवाह को रोकने में सहायता करता है। यह विटामिन यकृत के सामान्यरूप से कार्य करने के लिये महत्त्वपूर्ण है। यह ऊतकों में ऊर्जा उत्पादित सम्बन्धी गतिविधियों में भी योगदान देता है, विशेषकर स्नायु है तंत्र की गतिविधियों में।

Vitamin K स्रोत

विटामिन-के भोजन पदार्थों में पर्याप्तरूप से वितरित होता है। यह पत्तागोभी, गोभी, पालक, अल्फाल्फा, योगहर्ट, सोयाबीन में अधिक मात्रा में तथा गेहूं तथा जौ में कम मात्रा में होता है। पशु उत्पादों में यह बहुत कम होता है। मानव-दूध की अपेक्षा गाय का दूध इसका बेहतर स्रोत है। विटामिन-के का उत्पादन स्वस्थ आंतों में बैक्टीरिया द्वारा भी होता है।

विटामिन के अभाव के लक्षण

वयस्क व्यक्तियों में विटामिन-के के अभाव सम्बन्धी परीक्षणों को अभी तक दर्शाया नहीं गया है, न तो कुपोषित रोगियों पर न ही स्वयंसेवकों पर। इसलिये यह माना जा सकता है कि बुरे से बुरे भोजन में भी इस विटामिन की इतनी मात्रा होती है कि सामान्य मानव की आवश्यकता को पूरा किया जा सके। इसका अभाव केवल उसी अवस्था में हो सकता है जिसमें इस विटामिन का अवशोषण या उपयोग न किया गया हो। एंटीबायटिक द्वारा इलाज के कारण शरीर में बैक्टीरिया द्वारा विटामिन-के का
उत्पादन कम हो जाता है, जिससे विटामिन-के का स्तर कम हो सकता है।

विटामिन-के के अभाव से रक्त को थक्के बनाने में अधिक समय लगता है, जिसके कारण शरीर के किसी भी भाग में तीव्र रक्तस्त्राव हो सकता है। नाक से रक्त बहना या अन्य स्थान से रक्तस्राव होना जीवन के लिये खतरे का कारण हो सकता है।

विटामिन के स्वास्थ्य लाभ

विटामिन-के की खोज तथा पहचान एवं इसके साथ यौगिकों के विश्लेषण और संश्लेषण से रक्तस्राव का नियंत्रण तथा रोकथाम संभव हुई है।

नवजात शिशु में रक्तस्राव : जहां तक Vitamin K का प्रश्न है, शिशु इसके लिये एक विशेष दशा प्रस्तुत करते हैं। चूंकि डिंबवाहिनी या प्लेसेंटा द्वारा इस विटामिन की सीमित मात्रा ही संचारित हो सकती है तथा नवजात शिशु की आंतें स्वच्छ होती हैं और इस विटामिन का संश्लेषण नहीं कर सकती इसलिये कुछ शिशुओं को विटामिन-के की अतिरिक्त मात्रा की आवश्यकता होती है ताकि रक्तस्राव को रोका जा सके। इसे
पानी में घुलनशील या वसा में घुलनशील रूप में दिया जा सकता है। यदि माता को कोई एंटीकोएगुलेंट इलाज दिया गया है तो उसके शिशु को विटामिन-के की 2 मि.ग्रा. से 4 मि.ग्रा. मात्रा को जन्म के तुरंत बाद दिया जाना चाहिए।

पित्तीय अवरोध (Biliary Obstruction) : विटामिन-के की दवाईयां उन मामलों में बहुत महत्त्वपूर्ण होती हैं जिनमें इसके अवशोषण में अवरोध आया हो जैसे पित्त साल्टों की कमी, अग्न्याशय उत्सर्जन में कमी या पाचन निष्क्रियता के अन्य मामले। यदि ऐसे मामलों में आपरेशन किया जाना है तो यह आपरेशन-पूर्व एक आवश्यक चरण है। यह विटामिन तीन दिनों तक अंतपेशीय रूप से 10 मि.ग्रा. से 20 मि.ग्रा. प्रतिदिन की खुराक में आपरेशन से पहले देना चाहिए।

सावधानियां : यदि Vitamin K को बड़ी मात्रा में दीर्घकाल तक दिया जाये तो यह विषाक्त हो सकता है। ए. एम. स्मिथ तथा आर. पी. कस्टर द्वारा वर्णित विटामिन-के के
विषाक्तता के लक्षणों में रक्त में प्रोथ्रोबिन की कमी, लघु रक्तस्राव तथा गुरदे की व्याधियां हैं। पूर्वकालिक शिशुओं में जॉन्डिस या पीलिया तथा रक्ताल्पता या एनीमिआ हो सकते हैं।

 

 

 

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