वेद माता गायत्री एंव गायत्री मंत्र लेखन की महिमा ! Gayatri Mantra Lekhan

गायत्री वेदों की माता है, इसी से संपूर्ण वेद आदि का ज्ञान प्रकट हुआ है। इसलिए गायत्री को वेद माता कहा गया है ! समस्त विश्व की जननी और पालन करने वाली गायत्री की जो आराधना करता है, वह समस्त ज्ञान अधिकारी बन जाता है और ऐश्वर्य का स्वामी बन जाता है। क्यूंकि गायत्री मंत्र का देवता सविता (सूर्य) है, जिसे वेदों में संपूर्ण जगत को उत्पन्न करने वाला कहा गया है। नवग्रहों में जिसका सूर्य मजबूत होता है उसको यश,कीर्ति,मान-सम्मान बहुत मिलता है ! गायत्री मंत्र जप के दौरान साधक सूर्य के तेज का ध्यान करना चाहिए और जिस तरह सूर्य अंधकार को मिटाकर उजाला करता है उसी तरह गायत्री साधक को भी उनके गुणों को अपनाना चाहिए!

Gayatri Mantra Lekhan

गायत्री मंत्र लेखन(Gayatri Mantra Lekhan) का महत्त्व कम नहीं माना जाता । मंत्र जप से इसका महत्त्व अधिक ही है। मंत्र जप करते समय उँगलियों से जप और जिह्वा से उच्चारण होता है। मन को इधर-उधर भागने की काफी गुंजायश रहती है। परंतु गायत्री मंत्र लेखन के समय हाथ, आँखें, मस्तिष्क एवं सभी चित्तवृत्तियाँ एकाग्र हो जाती हैं, क्योंकि लिखने का कार्य एकाग्रता चाहता है। इसी से इसका महत्त्व भी बहुत माना गया है।

कहा जाता है कि हवन से मंत्र में प्राण आते हैं, जप से मंत्र जाग्रत होता है और लिखने से मंत्र की शक्ति आत्मा में प्रकाशित होती है। श्रद्धापूर्वक यदि शुद्ध मंत्र लेखन किया जाए, तो उसका प्रभाव जप से दस गुना अधिक होता है। शास्त्रों के अनुसार गायत्री मंत्र लेखन एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण साधना विधि है। इसमें किसी प्रकार का कोई प्रतिबंध नहीं है। जब भी समय मिले, मंत्र लेखन किया जा सकता है। चौबीस हजार मंत्र जप का एक अनुष्ठान होता है। जप की अपेक्षा मंत्र लेखन का पुण्य दस गुना अधिक है, अतः चौबीस सौ मंत्र लेखन से ही एक अनुष्ठान परा हो जाता।

गायत्री के जप की महिमा ! Gayatri Mantra

गायत्री के जप की महिमा के बारे में  शास्त्रों में कहा गया है, ‘गायत्र्यास्तु परमं जाप्यं न भूतो न भविष्यति’ गायत्री के समान ना कोई मंत्र हुआ है, न भविष्य में कभी होगा। भगवान श्री राम एवं श्री कृष्ण भी गायत्री मंत्र का नित्य जाप करते थे तथा इसी महाशक्ति से उन्होंने असुरों का संहार किया था। भगवत गीता में भगवान श्रीकण कहते हैं ‘गायत्री छंदसामहम्’ अर्थात मैं मंत्रों में गायत्री मंत्र हूँ। गायत्री मंत्र को सभी मंत्रो में श्रैष्ठ बताया गया है !

गायत्री का जप किसी भी जाति, धर्म, संप्रदाय का व्यक्ति कर सकता है, क्योंकि यह Gayatri Mantra सद्बुद्धि प्रदान करने का मंत्र है और आज हम सबको सद्बुद्धि की विशेष जरूरत है। सद्बुद्धि ही हमको नेक रास्ते पर प्रेरित करती है। स्वामी विवेकानंद ने कहा की अगर परमपिता परमेश्वर से कुछ माँगना हो तो सद्बुद्धि मांगनी चाहिये। जो समस्त सुख-समृद्धि व सुअवसरों को प्रदान करती है।’

गायत्री जप नर-नारी, बाल-वृद्ध तथा युवा सभी लोग कर सकते हैं। गायत्री साधना का प्रयोग हम अपने जीवन को ही प्रयोगशाला मानकर स्वयं करके देखेंगे तो अनुभव करेंगे की हमारे विचारों एवं भावों में सकारात्मक परिवर्तन आ रहा है। गायत्री जप से हमारा आंतरिक तेज बढ़ता जायेगा और आत्मविश्वास बढ़ता हुआ प्रखर व्यक्तित्व एवं उज्ज्वल चरित्र बनता चला जायेगा। गायत्री साधना से आपके आसपास के माहौल पर भी उसका असर दिखाई देगा। पूरे घर-परिवार एवं पडोस आदि में सात्विकता, शांति प्रेम एवं सद्भाव बढ़ता है ।

गायत्री साधना से उत्कृष्ट चिंतन, आदर्शमय चरित्र तथा उदार व्यवहार हो जाता है । गरीबी से मुक्ति, दुःख से छुटकारा, रोग-व्याधि से छुटकारा तथा भौतिक एवं आध्यात्मिक उन्नति सुनिश्चित रूप से होती है। नियमित रूप से कुछ दिनों-महीनों तक इस साधना को श्रद्धा-भावना के साथ करें तो थोड़ी ही अवधि में इसके परिणाम प्राप्त होते है। किसी भी साधना को सफल बनाने के लिए उसमे निरंतरता होनी आवश्यक है जिस तरह किसी परीक्षा में सफल होने के लिए निरंतर अभ्यास जरुरी होता है!  एक कहावत है ”करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान” अर्थात् बार-बार अभ्यास करने से मूर्ख व्यक्ति भी बुद्विमान हो जाता है।

गायत्री जप के दौरान आप साकार ध्यान में गायत्री माता के आंचल की छाया में बैठने तथा उनका दुलार भरा प्यार प्राप्त होने की भावना महसूस करे। निराकार ध्यान में गायत्री के देवता सूर्य की प्रभात किरणों के शरीर पर बरसने व शरीर में सूर्य की किरणों का तेज उतरने की कल्पना करते रहे। जप एवं ध्यान के एक साथ समन्वय से ही हमारा चित्त एकाग्र होता है।

शान्तिकुञ्ज गायत्री परिवार हरिद्वार

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